नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश के बाद सल्फर तिलहन फसलों के लिए सबसे ज़रूरी पोषक तत्व है। सरसों में सल्फर तेल बनने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है, इसलिए इसकी कमी से दाने और तेल दोनों पर असर पड़ता है।
सल्फर की कमी के लक्षण
सल्फर की कमी में नई (ऊपर की) पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, पत्तियां छोटी और कप जैसी मुड़ी हुई दिख सकती हैं, और फूल व फलियां कम बनती हैं। नाइट्रोजन की कमी में पुरानी (नीचे की) पत्तियां पहले पीली होती हैं — यही दोनों में फर्क पहचानने का आसान तरीका है।
सल्फर कब और कैसे दें
सल्फर को बुवाई के समय या उससे पहले मिट्टी में डालना सबसे असरदार है, ताकि फसल की शुरुआत से ही पौधों को यह मिलता रहे।
Kheti Sulphur-90 (Sulphur 90%) — लेबल के अनुसार मिट्टी जांच के आधार पर, सामान्यतः 10-25 किलो प्रति एकड़, या कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार।
Kheti Gypsum Gold (Calcium 23% + Sulphur 18%) सल्फर के साथ कैल्शियम भी देता है और मिट्टी की संरचना सुधारने में मदद करता है। लेबल के अनुसार मिट्टी जांच के आधार पर, सामान्यतः 250-500 किलो प्रति एकड़।
किन फसलों में सल्फर पर खास ध्यान दें
सरसों, राई, तोरिया, अलसी, मूंगफली, सोयाबीन और प्याज-लहसुन जैसी फसलें सल्फर ज़्यादा लेती हैं। हल्की रेतीली मिट्टी और कम जैविक पदार्थ वाले खेतों में कमी की संभावना ज़्यादा रहती है।
ध्यान रखें: किसी भी उत्पाद का प्रयोग उसके लेबल पर दिए निर्देशों के अनुसार ही करें और अपने क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञ से सलाह ज़रूर लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सरसों में सल्फर की कमी कैसे पहचानें?
ऊपर की नई पत्तियों का पीला पड़ना, पत्तियों का छोटा और कप जैसा मुड़ना, और फूल-फलियों का कम बनना इसके आम लक्षण हैं।
जिप्सम और सल्फर-90 में क्या फर्क है?
Sulphur-90 में 90% सल्फर होता है, जबकि जिप्सम में सल्फर के साथ कैल्शियम भी होता है और यह मिट्टी की संरचना सुधारने में भी मदद करता है। चुनाव मिट्टी जांच के आधार पर करें।
